द्रौपदी का चीरहरण

    0
    207
    द्रौपदी का चीरहरण
    द्रौपदी का चीरहरण

    आजकल कलर्स चैनल पर बी.आर.चोपड़ा निर्मित/निर्देशित प्रसिद्ध व लोकप्रिय सिरीयल महाभारत का पुन:प्रसारण हो रहा है. और संभवतः सभी इसे दोबार तो अवश्य देख चुके होंगे. इस धारावाहिक में हर कलाकार ने अपना किरदार बखुबी निभाया है. यह ऐसा महाकाव्य है जिसमें स्वार्थ, परमार्थ, छल-कपट, धर्म, अधर्म और दिव्य गीतोपदेश आदि सन्निहित हैं. द्यूतक्रीड़ा को ग़लत व नाशवान जानते हुए भी धर्मराज कहलाए जाने वाले युधिष्ठिर अपनी जिद व अहंकार वश जुए में अपनी पत्नी द्रौपदी सहित अपना सबकुछ हार जाते हैं.

    दु:शासन सारी मर्यादाओं का उल्लंघन करके, भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य व कृपाचार्य आदि धनुर्धारियों व ज्ञानियों से सज्ज, न केवल आंखों से अंधे अपितु दुर्बुद्धि दुर्योधन के पुत्र मोह में भी अंधे राजा धृतराष्ट्र की सभा में द्रौपदी को केशों से पकड़ कर, घसीटते हुए लाता है. व तत्पश्चात द्रौपदी को निर्वस्त्र करने का भरसक प्रयत्न करता है.

    निर्लज्ज व कायरों से भरी सभा में कोई भी इस कुकृत्य (जिसे एक तरह का बलात्कार प्रयास/श्रेणी कहना भी गलत नहीं होगा) का विरोध नहींं करता. सिवाय विदुर व विकर्ण के (दुर्योधन का भाई, जिसे कुंभकर्ण की तरह धर्मात्मा परन्तु भाई का आज्ञाकारी माना जाता था). माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्त की रक्षा करते है. उनकी माया व कृपा से द्रौपदी निर्वस्त्र होने से बच गई.

    अब प्रश्न यह है कि, ‘भीष्म’ कहे जाने वाले महान क्षत्रिय योद्धा व ज्ञानी पितामह ने अपनी व्यर्थ की प्रतिज्ञाओं का बंधन तोड़ कर, ‘क्षत्रिय धर्म’ का पालन क्यों नहीं किया. और स्वयं शस्त्र लेकर आगे क्यों नहीं बढ़े बल्कि इस कुकृत्य को होने दिया, अपितु उनको दुर्योधन को स्वयं दंड देना था, और तब जा के असली ‘भीष्म’ कहलाते.

    युधिष्ठिर जुए में स्वयं को हारने के बाद दास बन गए, और बिना अपने अन्य अनुजों को पूछे उनकी अनुमति के बिना जबकि वो भी द्रौपदी के पति थे,,, द्रौपदी को स्वयं की जिद, अन्याय व एक तरह से धर्म व मर्यादाओं का भी उल्लंघन कर ,जुए में वस्तु/धन संपत्ति की तरह दांव लगा दिया. उस समय तथाकथित ‘धर्मरूप’ युधिष्ठिर ने स्त्री-धर्म/पत्नी धर्म का पालन नहीं किया.

    भीम ने केवल द्रौपदी के हुए अपमान का बदला लेने की प्रतिज्ञा ली, अर्जुन जैसे महाबली श्रेष्ठ धनुर्धारी व अन्य भाई जबकि, सभी श्रेष्ठ क्षत्रिय/योद्धा होते हुए भी पत्नी को अबला बना दिया. अपमानित होने दिया और बड़े भाई की अवज्ञा को लांछन न लगे इसको अधिक महत्व दिया, व विकट संकट में पत्नी का साथ नहीं दिया. जबकि एक पति का अपनी पत्नी की रक्षा करना परम कर्तव्य होता है.

    मृतकों की सभा में सभी ने इस घृणित अपराध व नारी जाति के अपमान स्वरूप, बिलखती हुई द्रौपदी के प्रश्नों पर मौन साध लिया. हालांकि, जैसा कि हम सभी जानते हैं, अंत में एक महायुद्ध हुआ और तत्कालीन एक नए युग का प्रारंभ हुआ.
    जय श्री कृष्ण…

    Please click here to read more interesting articles