श्रीमद्भगवद्गीता-जीवन में प्रेरणा स्त्रोत

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    श्रीमद्भगवद्गीता-जीवन में प्रेरणा स्त्रोत
    श्रीमद्भगवद्गीता-जीवन में प्रेरणा स्त्रोत

    हजारों वर्षों से यही मान्यता है कि श्रीमद्भगवद्गीता साक्षात भगवान के श्रीमुख से निकली अनोखी दिव्य वाणी है। ऐसा माना जाता है कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने योग में स्थित होकर , अर्जुन को निमित्त बनाकर व कर्त्तव्य बोध कराकर, मानवमात्र के कल्याण हेतु गीता का उपदेश दिया था। श्रीमद्भगवद्गीता एक विलक्षण ग्रंथ है तथा इसकी महिमा असीम एवं अगाध है।इसका मुख्य उद्देश्य भी,हर काल व परिस्थिति में मानव-कल्याण के लिए ही निहित है।

    गीता का उपदेश हर काल में लोगों का मार्गदर्शन करता आ रहा है और आज भी इसकी सार्थकता यथावत है।मनुष्य को जीवन में, हर परिस्थिति में अपने कर्म अथवा कर्तव्य का सदैव विवेक, दृढ निश्चय, धैर्य व तत्परता से पालन करना चाहिए और कभी भी, चाहे कैसी ही समस्याएं व परिस्थितियाँ क्यों न हों,हताश व विमुख नहीं होना चाहिए ; अपितु डटकर सामना करना चाहिए।आत्मसंयम जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण है और अगर आप अपने उद्देश्य प्राप्ति के लिए दृढ हैं तो अवश्य सफल होंगे।

    गीता में कर्मयोग को विशेष महत्व दिया गया है। “कर्मन्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन” के द्वारा मनुष्यमात्र को प्राप्त कर्तव्य का पालन करने के लिए ही प्रेरणा दी गई है।अपने कर्तव्य व उद्देश्य की सफलता एवं प्राप्ति के लिए सपरिश्रम, सतत प्रयत्नरत रहना चाहिए; कर्मफल अथवा उसका परिणाम मनुष्य के आधीन नहीं है।भगवद्गीता, जो विज्ञान की सीमाओं को तोड़ती है,न केवल हिन्दुओं, अपितु विश्व के प्रत्येक मानव के लिए है। हिन्दुओं की तो सदियों से गीता के प्रति आस्था व धार्मिक भावनाऐं जुड़ी हुई हैं

    परिवर्तन संसार का नियम है और विज्ञान भी इसे मानती है। विज्ञान के अनुसार,’ऊर्जा न तो पैदा की जा सकती है और न ही नष्ट की जा सकती है ‘ , यह केवल स्वरूप बदलती है; हजारों वर्ष पूर्व गीता में वर्णित आत्मा की अमरता का सिद्धांत अथवा संदेश भी यही कहता है।गीता में आत्मा को सनातन(नित्य रहने वाली व अनादि) कहा गया है, अर्थात न ही यह कभी मरती है और न ही किसी समय में उत्पन्न होती है। न ही इसे शस्त्रादि काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न जल गीला कर सकता है और न ही वायु सुखा सकती है।

    भगवद्गीता ज्ञान का भंडार है, इसमें न केवल श्रेष्ठ व प्रेरणादायक उपदेश निहित हैं, अपितु यह जीवन जीने की कला भी सिखाती है।सबकुछ परमात्मा के ही अन्तर्गत है, उसके सिवाय कुछ नहीं है; इसी भाव में संपूर्ण गीता है । गीता में कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग व मोक्ष का विस्तृत वर्णन है, जिसको समझ पाना जन साधारण तो क्या, विद्वानों के बस की बात भी नहीं है।

    मनुष्य को सांसारिक व्यवहारों का भी सच्ची निष्ठा से पालन करना चाहिए। किसी भी मानव का जीवन स्वरूप क्या होना चाहिए; बताती है भगवद्गीता।बहुत से विद्वानों ने ज्ञान से परिपूर्ण गीता की बहुत सी टीकाएँ लिखी हैं।गीता में सृष्टि के ज्ञान का तार्किक एवं वैज्ञानिक रूप से वर्णन है।मानव अपनी बुद्धि का सदुपयोग करे,यही श्रेष्ठ उपलब्धि है और सद्बुद्धि का उपयोग करते हुए, संसार के कर्म अथवा कर्तव्य निष्ठा एवं सरलता से करता रहे, यही मुख्य सारांश एवं प्रेरणा है।

    सोमदत्त शर्मा