जन जन के राम, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम

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    जन जन के राम, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम
    जन जन के राम, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम

    कुसंगति से डाकू बने रत्नाकर ने ‘राम राम’ जपना भूलकर, ‘मरा मरा’ जपा, कायाकल्प हुई, महर्षि वाल्मीकि कहलाए व संस्कृत में अनोखा महाकाव्य ‘रामायण’ रच डाला. समयोपरांत गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रद्धा एवं भक्तिभाव से परिपूर्ण ‘रामचरितमानस’ की रचना की व समय समय पर अन्य कवियों, लेखकों ने भी विभिन्न भाषाओं में इसकी रचना की. वास्तव में रामायण एक ऐसा महाकाव्य है जो कि राम के जीवन के माध्यम से हमें जीवन की सच्चाईयों व कर्त्तव्यों से अवगत कराता है. श्रीराम के जीवन से जुड़ी लीलाओं व अनेक आदर्श शिक्षाओं से भरपूर ‘रामलीला’ सदियों से चली आ रही है व हर वर्ष की जाती है व आज भी इसकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है

    देहात हो या कस्बा,नगर हो अथवा महानगर लगभग हर किसी के मन में राम रचे,बसे हुए हैं.आज सामान्य रूप से मिलने पर भी अधिकांश लोग एक-दूसरे को ‘राम राम जी’ या ‘जय राम जी की’ रुपी अभिवादन करना नहीं भूलते हैं.

    हमारी हिन्दू संस्कृति श्रेष्ठ एवं सनातन मानी जाती है.पौराणिक मान्यताओं, ग्रंथों, ऋषियों-महर्षियों,प्रखर विद्वानों व शोधकर्ताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम त्रेता युग में साक्षात भगवान विष्णु के अवतार माने गए हैं व आज भी हमारे देश में असंख्य जन-मानस के हृदय में रचे-बसे हैं ; माने व पूजे जाते हैं. वे जन जन के लिए अत्यंत पूज्य हैं, श्रद्धा व आस्था के आधार हैं. हालांकि हमारे राष्ट्र में ‘विविधता में एकता’ होते हुए भी हरेक की अपनी अपनी श्रद्धा व विचार होते हैं

    हर वर्ष दशहरे पर रावण दहन द्वारा धर्म की अधर्म पर,सत्य की असत्य व अच्छाई की बुराई पर जीत दर्शायी जाती है और इन आदर्श शिक्षाओं के अनुसरण के लिए प्रेरित किया जाता है.
    श्रीराम ने सिखाया कि जीवन में विषम परिस्थितियां होने पर भी कैसे धैर्यवान, सहनशील, विवेकशील व नीति सम्मत रहा जाता है.उन्होंने पितृ-आज्ञा पालन,भ्रातृ प्रेम,सच्ची मित्रता पालन आदि के अनमोल उदाहरण दर्शाए ; स्वयं के सुखों को महत्वहीन मानकर त्याग किया, सत्य का साथ दिया,दयास्वरूप होकर सदैव कृपालु रहे व सभी को शरण दी. उनके न्याय पूर्ण,नीति सम्मत व उत्तम शासन को आज भी ‘रामराज्य’ की उपमा से जाना जाता है व अच्छे शासन के लिए कल्पना व अपेक्षा की जाती है.

    श्री राम ने अपनी श्रेष्ठ मर्यादाओं को सर्वदा सर्वोच्च स्थान दिया,उनका पालन किया और उसी कारण से वे ‘मर्यादा पुरुषोत्तम राम’ कहलाए. आज भी जनमानस द्वारा अपने जीवन में उन श्रेष्ठ शिक्षाप्रद मर्यादाओं की यथासंभव अनुपालना की अपेक्षा की जाती है.

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