कलत्र! तुझे अब घुटना होगा

    कलत्र तुझे अब घुटना होगा
    कलत्र

    कलत्र तुझे अब घुटना होगा, तिल तिल तुझको मरना होगा
    तू प्राणप्रिया है मेरे सूत की, छुप छुप आँहें भरना होगा।
    बलि वेदी पे मातृभूमि के, शौर्य का परचम लहरा होगा,
    अमर हुआ स्वर्णसिन्दूर तेरा, जब रक्त का कतरा बहता होगा।
    मैंने तो बस जन्म दिया था, पला बढ़ा उसकी ही रज में,
    गर प्राण निछावर हुए तो नव क्या, कर्ज दूध का अदा किया है।
    अब विश्वास करूँ मैं कैसे, उन राजनीती के आकाओं का,
    कर सौदा मातृ भूमि का जिसने, सन बासठ में ही सौंप दिया।
    करते कभी तेरे शौर्य पे संशय, कभी जयचंद बन जाते हैं,
    उरी, पुलवामा, मुम्बई और संसद जैसा प्रतिफल पाते हैं।
    बेटे की तो हुई शहीदी, क्या होगा इस विधवा का,
    राजनीती फिर शव पर उसके, जीवन का दाम लगाएंगे,
    वोट बटोरेंगे उस पर वो, रैलियों में तेरा जिक्र करेंगे,
    फिर पहुंचेंगे संसद वो, और हम रोटी को भी तरसेंगे।
    सफेदपोश बँगले का चक्कर, हमसे वो लगवाएंगे,
    छत के कीमत के एवज में, रिश्वत हमसे खाएंगे।
    हे पुत्रवधु! मुझे माफ़ करो, वो मंझधार में तुमको छोड़ गया,
    भूल गया वो सात वचन, सात जन्मों की कसमें तोड़ गया,
    तेरे चूड़ी की खनक, तेरे मेंहदी की महक,
    तेरे जोड़े की दमक, ये सब तो बस सपने थे।
    आलिंगन को महसूस करो, दामन को उसके पुष्ट करो,
    अंतर्मन को संतुष्ट करो, खुद को खुद से मजबूत करो।
    हे कलत्र! तुझे अब घुटना होगा, तिल तिल तुझको मरना होगा,
    तू प्राणप्रिया है मेरे सूत की, तुम्हे दंभियो और दुष्टों से लड़ना होगा।
    तुझे समाज से लड़ना होगा…

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