कानपुर: कुछ अनसुलझे राज़ जो सदा के लिए दफन हो गए।

    कानपुर: कुछ अनसुलझे राज़ जो सदा के लिए दफन हो गए
    कानपुर: कुछ अनसुलझे राज़

    2 जुलाई 2020 को कानपुर के चौबेपुर थानांतर्गत बिकरु गाँव में राहुल तिवारी नाम के एक शख्श के द्वारा मुक़दमा दर्ज कराने के बाद सीओ देवेंद्र मिश्र की अगुआई में पुलिस टीम रात के 1 बजे विकास दुबे के घर उसकी गिरफ्तारी के लिए पहुंची। वहां पहले से सुचना पाकर हिस्ट्रीशीटर के गुर्गे घात लगा कर किलेनुमा घर की छत से पुलिस पर हमला करते हैं और उन्हीं के हथियारों से आठ पुलिसकर्मियों की हत्या कर देते हैं। आनन फानन में अलसुबह मय पुलिस समेत पूरे गाँव को घेर लिया गया और घटनास्थल को सील कर दिया गया लेकिन तब तक विकास दुबे फरार हो चूका था। एक मीडिया रिपोर्ट की अगर माने तो विकास दुबे घटना को अंजाम देने के बाद अपने घर के पीछे के दवाजे से निकला और लगभग 7-8 किलोमीटर पैदल चलने के पश्चात साइकिल फिर लगभग 10 किलोमीटर की यात्रा के बाद उसे मोटरसाइकिल उपलब्ध करवाई गयी जिससे उसने कानपुर की सीमा को पार किया।

    क्या हमारे पुलिस महकमे के पास इतने भी संसाधन उपलब्ध नहीं थे की उसे कानपुर की सीमा के अंदर नहीं रोका जा सका, या कोई विभीषण ही उसे तड़ी पार करने में मदद की। इसने यूपी पुलिस को एक सप्ताह खूब नाच नचवाया, कभी फरीदाबाद तो कभी कहीं और का इनपुट मिलता रहा पर घटना के सात दिनों बाद 10 जुलाई को उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में कथित तौर पर उसकी गिरफ्तारी हुई, कुछ लोगों का मानना है कि उसने एनकाउंटर के डर से आत्मसमर्पण कर दिया। इस बीच उसके कई गुर्गों का पुलिस द्वारा उत्तर प्रदेश के विभिन्न स्थानों पर एनकाउंटर किया गया। उज्जैन पुलिस के द्वारा लगभग 8 घंटे की लंबी पूछताछ के बाद यूपी STF को विकास दुबे बिना ट्रांजिट रिमांड के बुलेट प्रूफ जैकेट पहना के सौंप दिया गया। अगले दिन यानी 11 जुलाई को सुबह तकरीबन 6 बजे उसका एनकाउंटर कर दिया गया।

    एसटीएफ ने प्रेस कांफ्रेंस में बताया कि उज्जैन से कानपुर लाते समय कानपूर के पास जिस गाडी में विकास दुबे था उसका एक्सीडेंट हो गया और मौके का फायदा उठा कर पुलिस की रिवाल्वर छीन कर भागने की कोशिश किया। जब रोका गया तो पुलिस पर हमला किया, जवाबी फायरिंग में उसे दो गोलियां लगीं और अस्पताल में मृत घोषित कर दिया गया। कुल मिला कर एक अपराधी मारा गया, आठ पुलिसकर्मियों के शहादत का बदला ले लिया गया और अपराध के एक अन्य युग का इतिश्री हुआ। एनकाउंटर की स्क्रिप्ट लिखने में भी कुछ अनसुलझे सवाल रह गए जैसा कुछ लोगों का सवाल रहा की आखिर उसकी वाहन टाटा सफारी से टीयूवी 300 में कैसे बदली, उसके बुलेट प्रूफ जैकेट का क्या हुआ वगैरह वगैरह।

    आइये अब एक नज़र विकास दुबे के इतिहास पर डालते हैं। ये तीन भाई थे, बाप किसान और इसके 2 बच्चे। जिसमें एक भाई की कुछ दिन पूर्व गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी। दो बेटे हैं जिसमें एक इंग्लैंड में रहकर MBBS की पढाई कर रहा है और दूसरा कानपुर में पढ़ता है। खुद विकास दुबे कानपुर के विठूर में स्कूल और कॉलेज चलाने के साथ साथ अवैध तरीके से जमीनों की खरीद फरोख्त कर धन अर्जन करता है। इसकी पत्नी ऋचा दुबे वर्तमान में सपा से जिला पंचायत सदस्य है और यही नहीं पिछले 15 वर्षों से गाँव का निर्विरोध प्रधान है तथा आसपास के गांवों में प्रधान इसकी मर्जी से ही बनते हैं साथ ही जिला पंचायत सदस्य की कुर्सी भी इसके पास ही होती है। अब आते हैं इसके राजनैतिक संरक्षण पर, कहा जाता है की सन 2000 में शिवली नगर पंचायत अध्यक्ष लल्लन बाजपेई से विवाद होने के बाद अपराध की दुनिया में कदम रखा था। उसके बाद सर्वाधिक राजनैतिक संरक्षण उसे बहन जी अर्थात बसपा का मिला जिसके बाद उसकी एकछत्र तूती बोलने लगी और भू माफिया बन अवैध तरीके से खरीद फरोख्त करने लगा। बीजेपी के दर्जा प्राप्त मंत्री संतोष शुक्ला को गोली मारने या साजिश करने का कथित तौर पर दोषी पाया गया। समय अपने सतत चाल से बीतता गया और उसी गति से उसका राजनीतिक प्रश्रय और अपराधिक ग्राफ दोनों बढ़ा। बसपा गयी सपा आयी, सपा गयी भाजपा आयी, इस बात को भी सिरे से खारिज करना अतिशयोक्ति होगी की किसी राजनैतिक दल और पुलिस महकमे ने उसे आश्रय नहीं दिया। कुल 60 मुकदमे इसके नाम से पंजीकृत हैं , निश्चित तौर पर बिना राजनैतिक छाया के ऐसा कर पाना संभव नहीं होगा। अवैध तरीके से अर्जित संपत्ति यथा बैंकॉक से लेकर दुबई तक का साम्राज्य यूँही नहीं स्थापित हुआ।
    एनकाउंटर के बाद दो तरह की थ्योरी सामने आयी- एक पक्ष में तो दूसरी विपक्ष में। विपक्ष के लोगों में दो खेमा था पहले का तर्क था कि ब्राह्मण होने की वजह से इस एनकाउंटर का विरोध मुट्ठी भर ब्राह्मण कर रहे हैं, दूसरा खेमा गला फाड़ फाड़ कर चिल्ला रहा है कि ऐसे दुर्दांत अपराधी को गोली न मारा जाय तो और क्या किया जाय। पूर्वांचल में कई ऐसे अपराधी हैं जो कोर्ट पहुंचे तो माफिया से माननीय बन गए और न्याय अधूरा रह गया।
    पक्षधर लोगों में भी दो खेमा था, एक का कहना था कि ब्राह्मण होने के वजह से उसका एनकाउंटर हुआ दूसरे का कहना था कि वो एनकाउंटर से दुःखी नहीं हैं अपितु राज उगलवाने के बाद उसका एनकाउंटर हो सकता था, क्योंकि जिस बी ग्रेड मूवी का फिल्मांकन पहले किया गया वो 2-4 दिन की पुलिस रिमांड के बाद भी हो सकता था। एक लेखक के तौर पर मैं पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर कलम नहीं चला सकता लेकिन समाज के मुट्ठी भर तथाकथित प्रबुद्धजन इस बात को राजनीती से ओत प्रोत कर जातिगत रंग देने में लगे हैं।

    एनकाउंटर सही था या गलत ये तो जांच का विषय है। भारतीय होने के नाते यहाँ के पुलिस अधिकारियों के प्रति हर नागरिक की संवेदना लाज़मी है लेकिन चर्चा तो इस विषय पर भी होनी चाहिए की आखिर घटना के अगले दिन फोरेंसिक टीम ने घर में उपस्थित साक्ष्यों की तथाकथित जांच के तुरंत बाद उन्हें नष्ट क्यों कर दिया..? क्या सीसीटीवी फुटेज निकलवाने की जरूरत नहीं पड़ी..? साल 2000 के बाद से 2020 के बीच लगभग 20 वर्षों में आखिर वो कौन लोग थे जिसका इसे संरक्षण प्राप्त था..? 60 मुकदमे और वो बरी आखिर ये कैसे संभव हो पाया..? जांच उस थाने में कार्यरत उन 25 पुलिसकर्मियों की क्यों नहीं हुई जिनके सामने दर्जा प्राप्त राज्य मंत्री को गोली मारी गई और उन पच्चीसों में से किसी ने इसके खिलाफ जुबान नहीं खोला..? शहीद सीओ देवेंद्र मिश्रा के उन पच्चासों चिट्ठियों का क्या हुआ जिसको एसएसपी अनंतदेव तिवारी के द्वारा फाड़ दिया गया। आखिर वो कौन सी रकम थी जिसके एवज में SHO विनय तिवारी ने अपने साथियों के ही खून का सौदा कर डाला..? आखिर वो कौन सा धंधा या व्यापार था जिससे बैंकॉक में एक होटल में शेयर, लगभग 25 से अधिक फ्लैट और मकान बनाया था उसने..? बिकरु में किलेनुमा वो मकान जिसके छत से गोलियां बरसाई गयी थीं उसमें बहुत से राज दफ़न हो गए।

    ये कुछ वैसा ही हुआ जैसा आरुषि तलवार हत्याकांड में हुआ था कि पुलिस द्वारा सारे साक्ष्यों की ऐसी लीपापोती की गयी थी की सीबीआई के हाँथ कुछ लगा ही नहीं। खुद विकास दुबे में मध्यप्रदेश पुलिस के रिमांड पर ये कबूल किया था कि वो लाशों को फूंकने की फिराक में था, उसकी इतनी हिम्मत आखिर कैसे बढ़ी। सपा से उसके संबंधों की जांच आखिर क्यों नहीं हुई, अन्य सभी राजनैतिक दलों के संरक्षण का भी पता नहीं चल पाया। उसको मारना गलत नहीं था पर उसके गुनाहों के राजनैतिक प्रश्रय वाले राज़ों का दफन हो जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। व्यक्ति कोई भी हो जान के बदले जान ही लेनी चाहिए पर कुछ ऐसी युक्ति लगायी गयी होती की उसको विकास दुबे बनने के पूर्व अमर दुबे बनने तक ही सिमित कर दिया गया होता। ये विकास दुबे हमारे न्यायपालिका की कार्य कुशलता और कार्यपालिका की ईमानदारी पर प्रश्नचिन्ह के साथ साथ विधायिका के आपराधिक प्रश्रय की वजह से सरकार पर गहरा धब्बा छोड़ गया। जिसकी वजह से हो सकता है विकास दुबे का बेटा ही उन्हीं संरक्षणों के बलबूते कल को अपने बाप की जगह ले ले।

    खैर अब जो हुआ वो हुआ, खबरें और सवाल तो सदा ही जीवंत रहेंगे। लाशों के ऊपर से गुजर के तो देश की राजनीती ही खड़ी है जो हमारे लिए कानून बनाती है। सरकारें आएँगी जाएंगी, अपराधियों की चांदी हर वक़्त रहेगी। एक तथ्य अनायास ही मन मस्तिष्क में आ जाता है कि आखिर चुनावों में जो धन पानी की तरह बहाया जाता है वो आता कहाँ से है, कहीं ऐसा तो नहीं की वो किसी गरीब दुखिया का मेहनत और पसीने से अर्जित खून है। एक नहीं लाखों जयचन्द विनय तिवारी की तर्ज पर पुलिस महकमे में होंगे जो विकास दुबे के बराबर सज़ा के भागी हैं। भ्रष्ट नेताओं और अपराध के दुनिया के शहंशाह जब जेल के अंदर से चुनाव लड़ के चुनाव जीत सकते हैं तो इस जहाँ में कुछ भी संभव है। आखिर हमारा संविधान ही इसकी इजाजत देता है। बहरहाल इस हमाम में सब नंगे, हर हर गंगे, हर हर गंगे।