काव्यांजलि भाग-११

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    काव्यांजलि भाग-११

    मां

    बैठाते वक्त डोली में
    बढ़ते सैलाब को रोक आंखों में ,
    जीवन का हर पाठ पढ़ा दिया
    मां तूने मुझे जीना सिखा दिया ।।

    मां तुम अचल ‘पर्वत’ सी
    तूफानों के थपेड़े सह कर भी ,
    डटी रहीं अपने पथ पर
    मुझे भी मुश्किलों से लड़ना सिखा दिया ।
    मां तूने मुझे जीना सिखा दिया ।।

    मां तुम अविचल बहती ‘सरिता’ सी
    कल-कल करती मधुर ध्वनि, तुम ‘कविता’ सी ,
    क्यूं थकती नहीं कभी इस अनवरत चाल से ?
    तुमने जीवन के पथ पर दौड़ना भी सिखा दिया ।
    मां तुमने मुझे जीना सिखा दिया ।।

    मां तुम एक विशाल ‘वृक्ष’ सी
    मुझे अपनी छाया बना दिया,
    जीवन भर देना ही है हमें
    सहज ही झुकना सिखा दिया ।
    मां तूने मुझे जीना सिखा दिया ।।

    ऐसा लगता है कि ‘सूर्य’ आपसे
    ‘चांद’ भी आप हो ,
    जब चलती हो तो ‘दिन’ रहे
    थम जाओ तो ‘रात’ हो ।
    समय कभी ठहरता नहीं
    मुझे यह एहसास करा दिया ।
    मां तुमने मुझे जीना सिखा दिया ।।

    देखा है उस ‘वृक्ष’ को टूटते हुए
    ‘पर्वत विशाल’ को फूट कर रोते हुए ।
    ‘शीतल नीर’ को भी ताप में तपते हुए ,
    जीवन के इस कटु- सत्य का दर्पण दिखा दिया ।
    मां तूने मुझे जीना सिखा दिया ।।

    • सुलक्षणा मिश्रा

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    मैं सुलक्षणा मिश्रा जो कि उत्तर प्रदेश के एक छोटे से जिला मैनपुरी की रहने वाली हूं व उ.प्र. सरकार में एक शिक्षिका के पद पर कार्यरत हूं। मुझे कविता लिखने का शौक तो बचपन से ही था,परंतु प्रथम बार मैंने अपने मन के भावों को लेखनी के माध्यम से उस समय व्यक्त किया जब मैं कक्षा-८ की छात्रा थी। जब मेरी कविताओं को मेरे गुरूजनों,माता-पिता एवं कुछ परिचित कवियों द्वारा सराहा गया,तो मुझे अपने भावों को शब्द देने में और अधिक रुचि आने लगी और कई बार स्थानीय कवि-सम्मेलनों में मंच साझा करने का अवसर भी प्राप्त हुआ। आज मैं इस प्लेटफार्म के माध्यम से उन्ही कविताओं के कुछ अंश आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हूं, आशा है कि आपको पसंद आयेंगे। धन्यवाद।