काव्यांजलि भाग-१५

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    काव्यांजलि भाग-१५
    अफसोस

    अफसोस

    इंसान तू क्या से क्या हो गया ?
    बनाया था तुझे इंसानियत का पुतला
    जुबान दी बोलने को
    ये सुंदर सा मुखड़ा
    दोनों पैरों पर खड़ा किया
    ताकि हाथों से मानव सेवा करे
    अरे तू तो फिर चौपाया हो गया
    बनाया था क्या तू क्या हो गया ?

    सोचा न था कि तू
    मर्यादा की हर हद पार करेगा
    भूख इतनी बढ़ जाएगी कि
    अन्न छोड़ मांसाहार करेगा
    त्याग देगा सब मूल्य
    जानवर सा बर्ताव करेगा
    ध्येय क्या था तेरा तू क्या हो गया ?

    मंदिरों के ऊंचे गुम्बद
    नीचे झांकने लगे
    कदर मैंखानों की खुद से ज्यादा मांपने लगे
    लगी है लंबी कतारें
    मदिरापान के लिए
    होड़ है महंगे शौकोशान के लिए
    मंदिरों की सीढ़ियां चढ़ना तो अब भूल ही गया।

    उसे भी अफ़सोस बहुत होगा
    अपनी इस कृति के लिए
    बनाया था प्रकृति का मित्र
    न था तू शत्रुत्रा के लिए
    फिर क्यों किये जा रहा है ये अमानवीय कृत्य ?
    इंसान कम थे क्या
    दुश्मनी निभाने के लिए
    जो मासूम जीवों का
    सुख भी तुझे नागवारा हो गया
    इंसान तू क्या से क्या हो गया ?

    सुलक्षणा मिश्रा

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    मैं सुलक्षणा मिश्रा जो कि उत्तर प्रदेश के एक छोटे से जिला मैनपुरी की रहने वाली हूं व उ.प्र. सरकार में एक शिक्षिका के पद पर कार्यरत हूं। मुझे कविता लिखने का शौक तो बचपन से ही था,परंतु प्रथम बार मैंने अपने मन के भावों को लेखनी के माध्यम से उस समय व्यक्त किया जब मैं कक्षा-८ की छात्रा थी। जब मेरी कविताओं को मेरे गुरूजनों,माता-पिता एवं कुछ परिचित कवियों द्वारा सराहा गया,तो मुझे अपने भावों को शब्द देने में और अधिक रुचि आने लगी और कई बार स्थानीय कवि-सम्मेलनों में मंच साझा करने का अवसर भी प्राप्त हुआ। आज मैं इस प्लेटफार्म के माध्यम से उन्ही कविताओं के कुछ अंश आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हूं, आशा है कि आपको पसंद आयेंगे। धन्यवाद।