श्रीकृष्ण-सुदामा मैत्री — ‘एक सच्ची मित्रता का आदर्श ‘

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    श्रीकृष्ण-सुदामा मैत्री -- 'एक सच्ची मित्रता का आदर्श '
    श्रीकृष्ण-सुदामा

    आजकल दूरदर्शन चैनल पर श्री रामानंद सागर निर्मित व निर्देशित लोकप्रिय व मनोरंजक सिरियल “श्री कृष्ण” का पुनः प्रसारण हो रहा है. यह कई साल पहले प्रसारित हुआ था परन्तु तब नौकरी आदि की व्यस्तता के कारण आधा-अधूरा ही देख पाया था. अधिकांश लोग इसे पहले ही देख चुके हैं, दोबारा भी देख रहे हैं व इन पौराणिक कथाओं को अच्छी तरह जानते हैं ; बचपन से ही सुनते व पढ़ते भी आए हैं.

    कुछ दिन से कृष्ण-सुदामा चरित्र,मैत्री व मिलन आदि के वृत्तांत का प्रसारण चल रहा था; बहुत ही सुन्दर और हृदय को छूने वाला प्रसंग लगा. राजा-रंक की सच्ची मित्रता के असाधारण मिलन का उदाहरण दर्शाया है व इसे आज भी याद किया जाता है. प्राचीन काल से ही हमारी संस्कृति एवं परंपराओं में मित्रता का बहुत ही महत्व रहा है. द्वापर युग के श्रीकृष्ण-सुदामा की मित्रता तो वस्तुत: ‘मैत्री’ का अनोखा व सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है और सदा से ही इसे देते आ रहे हैं

    सुदामा एक बहुत ही निर्धन विप्र था और श्रीकृष्ण का बाल सखा व परम मित्र था. वह इतना निर्धन था कि परिवार को भरपेट भोजन भी नहीं मिल पाता था.वह न केवल विद्वान था अपितु श्रीकृष्ण का परम भक्त भी था और उसने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने बाल सखा का कभी स्मरण नहीं छोड़ा.वे भक्ति रुपी प्रेम के धनी तो थे ही अपितु उन्हें ‘भक्तराज’ भी कहा जाता था.

    पत्नी वसुंधरा के समझाने पर सुदामा, श्रीकृष्ण से मिलने की ललक और झिझक लेकर किसी तरह अपने बाल सखा द्वारिकाधीश(श्रीकृष्ण) के द्वार पहुंचा. सुदामा के आगमन का पता लगते ही श्रीकृष्ण अति भावुक होकर,नैनों में आंसू लिए नंगे पैर ही महल से दौड़ते हैं व सुदामा को बहुत ही प्रेम व आत्मीयता से गले लगाते हैं. दोनों के मिलन का बहुत ही सुन्दर,मन को छूने वाला व भावनात्मक दृश्य है; वास्तव में यह प्रसंग मन को छू गया. सच्ची मित्रता भी वास्तव में एक तरह की ममता रुपी ही मानी गई है. कहना चाहूंगा कि कृष्ण सुदामा की मित्रता लोगों को इतना प्रभावित करती है कि बहुत से व्यक्तियों ने तो लोकप्रिय धुन “अरे द्वारपालो कन्हैया से कह दो….” को अपनी काॅलरट्यून में लगा रखा है.

    सुदामा द्वारा लाई गए चार मुट्ठी तन्दुल (चावल) की भेंट को तो श्रीकृष्ण ने अद्भुत व अमृत समान माना व अति चाव से ग्रहण किया. सुदामा कुछ दिन महल में रहे ,मन में अंतर्द्वंद चलता रहा परन्तु श्रीकृष्ण से कुछ नहीं मांगा. श्रीकृष्ण सर्वज्ञाता तो थे ही, बिना मांगे ही सुदामा के जीवन का कायाकल्प ही कर दिया.सुदामा अपने मित्र से विदाई लेकर वापिस पहुंचा तो अपनी कुटिया की जगह महल व धन संपन्न परिवार पाया.

    पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, वास्तव में यह एक भक्त और भगवान का ही मिलन था.
    यद्यपि आज के युग में ऐसी मित्रता दुर्लभ व असंभव है और न ही हम सोच सकते हैं, तथापि मनुष्य को यथासंभव, मित्रता के आदर्श पालन व प्रस्तुत करने के प्रयास करने चाहिएं.

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