श्रीमद्भगवद्गीता व आत्मसंयम

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    श्रीमद्भगवद्गीता व आत्मसंयम
    आत्मसंयम

    पिछले लेखों में, मैंने श्रीमद्भगवद्गीता में कर्मयोग अर्थात् कर्म-कर्तव्य की मनुष्य जीवन में श्रेष्ठता व ‘जीवन में प्रेरणा स्त्रोत’ के बारे सरल अर्थों में बताने का प्रयास किया था.गीता अत्यन्त गहन व उत्तम भावों का भंडार है और यदि मनुष्य अपने जीवन में उनका यथासंभव अनुसरण करे तो अवश्य ही वांछित उद्देश्य में सफलता प्राप्त कर सकता है.मनुष्य का जीवन में हर परिस्थिति में कल्याण हो, यही गीता का मुख्य उद्देश्य है.

    गीता में धैर्य अथवा आत्मसंयम को मानव जीवन में सफलता प्राप्ति के लिए बहुत महत्व दिया गया है.स्वयं के मन की चंचलता व इन्द्रियों को वश में रखना अर्थात् अपने आप पर काबू रखना व सहनशीलता रखना ही आत्मसंयम कहलाता है.नि:संदेह ही इन्द्रियों व चंचल मन को वश में रखना इतना आसान नहीं है परन्तु अभ्यास, दृढ़ निश्चय व स्थिर बुद्धि से सफलता प्राप्त की जा सकती है.इसके लिए मन की प्रसन्नता, सार्थक सोच व शान्त भाव रखना भी जरूरी है; व्यर्थ की चिंताएं ही मनुष्य का मनोबल गिराती हैं.

    सांसारिक सुखों व वस्तुओं की प्राप्ति इच्छा के आधीन नहीं है अपितु कर्म पुरूषार्थ के आधीन है.मोह व लोभादि के कारण मनुष्य को सतत इच्छाओं की प्राप्ति व पूर्ति की ही चिंता लगी रहती है.उनमें बाधाएं आने व पूरा न होने पर मन व्यथित होता है और क्रोध पैदा होता है व मनुष्य न करने वाले काम भी कर जाता है ; क्रोध के कारण बुद्धि अथवा विवेकशीलता नष्ट हो जाती है और वही उसके पतन अथवा असफलता का कारण होता है.अत: विवेक को बनाए रखना व मन को शांत रखना बहुत जरूरी होता है,इनकी पालना से ही आत्मविश्वास बढ़ता है व स्वत: ही आत्मसंयम प्राप्त हो जाता है जो कि सदैव सफलता के द्वार खोलता है.यही निश्चयात्मक सोच अथवा बुद्धि ही कर्तव्य क्षेत्र में सफलता दिलाती है.

    जीवन में परिस्थितियां बदलती रहती हैं, परेशानियों व असफलताओं का सामना भी करना पड़ सकता है , परन्तु धैर्यवान व्यक्ति को कठिन व अवांछित परिस्थितियां भी कमजोर नहीं कर पाती हैं.मनुष्य सतत दृढ़ पुरुषार्थ से अपना उद्धार करे.

    कभी भी निराश नहीं होना चाहिए,समय परिवर्तनशील होता है;सफल जीवन की प्ररेणा भी देता है.खुद की क्षमता का आकलन करना चाहिए व आत्मविश्वास रखना चाहिए,अवश्य ही सफल होंगे. आधुनिक जीवन में संशय व तनाव ही दुःख व असफलताओं का कारण बनते हैं अतः तनाव से शान्तचित्त द्वारा हमेशा मुक्त रहें.सदैव धैर्य,आत्मविश्वास व सार्थक सोच रखें.अपने काम को तन्मयता व परिश्रम से करते रहने की प्राथमिकता दें.खुद पर पूरा भरोसा रखें; अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए धैर्य व परिश्रम से निरन्तर प्रयास करें, जीवन में निश्चित रूप से सफल होंगे.

    सोमदत्त शर्मा

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