बेरोजगारी और निजीकरण

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    बेरोजगारी और निजीकरण
    बेरोजगारी और निजीकरण

    बीते गुरुवार को राष्ट्र के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के 70वें जन्मदिवस को बड़ी धूमधाम से मनाया गया। ये दिन इसलिए भी याद किया जाएगा क्योंकि भारतीय शासन पद्यति से छुब्ध विश्व का सबसे बड़ी युवाओं की संख्या रखने वाले देश के बेरोजगारों ने वर्तमान परिपेक्ष्य के ज्वलंत मुद्दों को ध्यान में रखते हुए इसे बेरोजगार दिवस के रूप में मनाया। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने 5 वर्ष के संविदा वाली बात कर समस्त सरकारी नौकरों के जीवन में उथल पुथल मचा दिया है। विरोध करने पर देशद्रोही घोषित कर लाठियां बरसाई जाती है।

    आइये हम दो शब्दों यथा बेरोजगारी और निजीकरण को एक सूत्र में पिरोते हैं। एक छोटा सा उदाहरण दूंगा, 12.27 लाख कर्मचारियों के साथ, भारतीय रेलवे दुनिया की आठवीं सबसे बड़ी व्यावसायिक इकाई है। सूचना का अधिकार कानून के तहत मांगी गई जानकारी से जो जवाब मिला है, वह चौंकाने वाला है। वर्ष 2008 से लेकर 2019 तक एक भी साल ऐसा नहीं रहा, जब रेलवे के जितने कर्मचारी सेवानिवृत्त हुए, उससे अधिक नई भर्तियां हुईं हों। लगभग 2 लाख 70 हज़ार के करीब पद अभी भी रिक्त पड़े हैं। आंकड़ों पर ध्यान दें तो 2008-09 में रेलवे में कर्मचारियों की कुल संख्या 13,86,011 थी जबकि वर्ष 2016-17 के दौरान घट के रेलवे में कुल 13,08,323 कर्मचारी कार्यरत रह गए। वर्ष 2008 से लेकर अब तक सेवानिवृत्त कर्मचारियों कुल संख्या लगभग 5 लाख 50 हज़ार के आस पास है जबकि इस दौरान नई नियुक्तियों की संख्या लगभग 2 लाख 38 हज़ार है (RRB NTPC 2019, 1लाख 40 हज़ार पद अब भी लंबित है जिनको जोड़ा गया है)। लगभग 2 लाख 10 हज़ार पद इनके अनुसार अब भी रिक्त हैं। इसका कारण रेलवे में तकनीकी उन्नति भी बताया जा रहा है। अब छंटनी के बाद इस बात पर भी दूरदर्शिता होनी चाहिए कि भविष्य में इन लोगों का समायोजन किस तरह हो।ये सत्य है कि सभी को सरकारी संस्थानों में समायोजित नहीं किया जा सकता।

    अब आते हैं निजी क्षेत्रों में तो GST और नोटबन्दी जैसे बिना योजना के लिए गए निर्णयों ने लाखों छोटे उद्यमों की कमर पहले ही तोड़ दी फिर ये कोरोना.. नोटबन्दी की वजह से इन छोटे उद्योगों में काम करने वाले लगभग 15 लाख लोग बेरोजगार हुए। नोट बंदी के कारण अचानक 86 फीसदी नोट चलन से बाहर हो गया था और लोगों को पैसे के लिए बैंकों और एटीएम के बाहर घंटों लाइनों में खड़ा रहना पड़ा था। इस वजह से शहर के हजारों मजदूरों के परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया। वहीं डिमांड में कमी के चलते इस दौरान कई यूनिटों ने अपने उत्पादन कम कर दिए थे। जिससे निराशा का माहौल और बढ़ गया है और अगर बैंकों का एनपीए बढ़ा भी तो कोई बड़ी बात नहीं होगी। कुल मिला के सरकारें रोजगार को लेकर निराशा के अलावा कुछ भी नहीं दिया। ये बेरोजगारी का भयावह स्थिति तो सिर्फ इन निर्णयों के वजह से था, जब हम कोरोना की बात करें तो निश्चित तौर पर वैश्विक रूप से बुरा प्रभाव था पर भारत मे लगभग 12 करोड़ लोगों ने अपना रोजगार खोया।

    सीएमआईई के आंकड़ों के अनुसार अप्रैल में मासिक बेरोजगारी दर में 23.52 प्रतिशत दर्ज की गई जबकि यह मार्च महीने में 8.74 प्रतिशत थी। रिपोर्ट में कहा गया कि शहरी इलाकों में बेरोजगारी दर ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक है। लॉकडाउन से दिहाड़ी मजदूरों और छोटे व्यवसायों से जुड़े लोगों को भारी झटका लगा है। इनमें फेरीवाले, सड़क किनारे दुकानें लगाने वाले विक्रेता, निर्माण उद्योग में काम करने वाले श्रमिक और रिक्शा चलाकर पेट भरने वाले लोग शामिल हैं। अब आते हैं निजीकरण पर… ये मानव स्वभाव है कि जिस काम को करने में व्यक्ति असमर्थ या किंकर्तव्यविमूढ़ होता है तो या तो उस काम को छोड़ देता है या दूसरे उस शक्तिशाली व्यक्ति को सौंप देता है जो सक्षम हो। बात साफ है कि यदि सरकार सामर्थ्यवान होती तो सिस्टम में बैठे लोगों से उन्हीं तरीको से काम करवाती जिन तरीको के लिए वो निजी हांथों में सौंप रही है। निश्चित तौर पर जिन क्षेत्रों को जिन निजी हांथों में सौंपा जा रहा है उसमे वो “मिनिमम इनपुट मैक्सिमम आउटपुट” के सिद्धांत पर काम करेंगी जिससे कर्मचारियों का शोषण और उपभोक्ताओं का आर्थिक दोहन बढ़ जाएगा। कुछ निजी संस्थानों के पुराने उदाहरण साफ जल से पारदर्शी है, निजी शिक्षण संस्थान अभिभावकों का शोषण कर रहे हैं तो निजी अस्पताल मरीजों का अथाह खून चूस रहे हैं। इस बात को भी नकारा जाना गलत होगा कि इन्हें राजनैतिक संरक्षण प्राप्त नहीं है। 10वीं कक्षा के रजिस्ट्रेशन के नाम पर पांच गुना शुल्क उगाही का प्रमाण डंके की चोट पर दे सकता हूँ, उसके बाद विरोध करने पर देख लेने की धमकियां किसी भी हालत में रामराज्य को निश्चित ही नकारती हैं। अब आप कहेंगे कि उसका देखरेख CBSE नियामन करती है। ऊपर से लेकर नीचे तक सभी बिके हुए हैं, कोई किसी का दर्द नहीं सुनने वाला।

    आखिर मेदांता, वंदे भारत और DPS जैसी सुविधाएं अगर सरकार अपने बल पर दे पाने में सक्षम नहीं हैं तो आखिर सरकारों की क्या आवश्यकता है। कृपा कर के संवैधानिक सुधारो का नाम मत लेना। उन सफेदपोशों जैसे मक्कार और मुफ्तखोर कोई नहीं होगा जो देश के नागरिकों का पेट काट कर खुद की झोली सतत प्रक्रिया के तहत भर रहे हैं। सरकारों का ये कैसा दोहरा चरित्र है कि खुद लगभग ढाई लाख रुपये के प्रतिमाह की वेतन भत्ते बिना ज्ञान और कौशल परीक्षण के चाहिए और 25 से 30 हज़ार प्रतिमाह की सैलरी पाने वाले को 5 वर्ष संविदा पर रहकर खुद को साबित करना होगा। उसके बाद उन संविदाकर्मियों को परमानेंट करने के नाम पर बड़ी रकम उन्हीं तथाकथित नीति निर्धारकों को अदा करने होंगे जो शायद ही अपना नाम भी ठीक ढंग से लिख पाते हैं या अँगूठाटेक हैं।

    मैं अपने इस लेख के माध्यम से उन तमाम सफेदपोशों को संदेश देना चाहता हूँ जो 5 साल बाद खुद की हैसियत निर्धारित करते हुए वो सत्ता जाने के बाद भोली जनता के पैसे पर ऐश करने के बाद फर्श पर आने वाले हैं। तुम त्रस्त और विपदाग्रसित जनता के आंसुओं में तैर कर बैतरणी पार नहीं कर पाओगे भगवान के घर मे देर है पर अंधेर नहीं हैं। सत्ता की सारी साजिशें जनता समझती है, अगर तुम बदलाव नहीं कर पाए तो तुममें और उनमें कोई अंतर नहीं है। ये दुष्यंत कुमार के क्रांतिकारी सम्बोधनों को सुनने वाली पीढ़ी है, लाठी की मार और हिटलर की चाल से नहीं डरने वाली।

    एक बात साफ है नौकरी दो या सत्ता वापस करो। तीसरा कोई विकल्प नहीं बचा।

    जय हिन्द ।