वक़्त को मनाना है…

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    वक़्त को मनाना है
    वक़्त

    थोड़ा गुमसुम, थोड़ा चुपचाप, थोड़ा सा बेगाना है।
    ये हमसे है नाराज, हमें इस वक़्त को मनाना है ।।

    ये शुरुआत से इतना खुदगर्ज नहीं था।
    देर तक रूठे सबसे, ऐसा इसको कोई मर्ज ना था।।
    ये खुश होता था, सबका साथ देख कर।
    सब्र की घड़ी में सबका, हाथों में हाथ देखकर।
    ना जाने क्यों है यह नाराज, अब पूछे सारा जमाना है।
    ये हमसे है नाराज, हमें इस वक़्त को मनाना है।।

    कुछ सालों पहले ही, इसकी परेशानी शुरू हुई।
    जब बनावटी शौकों से, इस दिल की गुफ्तगू हुई।।
    जब निकले सब अपनी अपनी मंजिल को कुछ बनने।
    घर से दूर अलग दुनिया में, कुछ अलग हासिल करने
    धीरे धीरे घर आना जाना कुछ कम हुआ,
    फिर अपनों से कम हुई बातें, इसी से वक़्त को गम हुआ।।
    यह गुस्सा आज का नहीं, लगे थोड़ा पुराना है।
    ये हमसे है नाराज, हमें इस वक़्त को मनाना है।।

    कुछ शौक हमारे जो, इस वक़्त को अजीत हुआ करते थे।
    जब सब साथ बैठकर, दिल खोलकर हंसा करते थे।
    हम करते हैं याद आज भी उस कल को,
    वो बचपन के सब किस्से, और घर की छत पर बीतें पल को ।।
    ये मसरूफियत भाती नहीं हमें भी ,
    इसको अब यह समझाना है।
    ये हमसे है नाराज, हमें इस वक़्त को मनाना है।।

    – जया साराभाई

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